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सुना हूं इश्क का भी अलग ही हिसाब है
कर लेता हूँ बर्दास्त हर दर्द इसी आश के साथ
शीशा तो टूट कर अपनी कशिश बता
जान गई थी हमे दर्द मे मुस्कुराने
तेरा और मेरा इतना ही किस्सा है
मुद्दत गुजर गई कि यह आलम
दर्द बनकर ही रह जाओ तुम
सब सो गए अपना दर्द अपनों को सुना के
नफरत करना तो कभी सीखा ही
तेरा ख्याल दिल से मिटाया नहीं अभी
मेरी तलाश का जुर्म है या
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चलते थे इस जहां में कभी सीना
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