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ये सर्द रात ये आवारगी,ये
मोहब्बत की आड़ में जिस्म का
सबसे मुश्किल काम है समेटना
एक बार तो मुझे चाहने का
कुछ लोगों के शौक था मुझे
मुकम्मल सी लगती है मुझे तेरी हर बात
जिस तरह से मेरे ख्वाब हो
बहुत मेहरबान है मुझ
कुछ याद आया तो लिखेंगे फिर कभी
ये फकत मिट्टी के बर्तन नहीं है साहेब
होगे आप  हकीक़त  किसी और  के
सुना हूं इश्क का भी अलग ही हिसाब है
कर लेता हूँ बर्दास्त हर दर्द इसी आश के साथ
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